वन एवं वन्य जीव, पर्यावरणीय अध्ययन में पढ़ें |  Forest and wildlife, EVS Notes

वनों से हमें कागज, दियासलाई, रेशम, रबर आदि उद्योगों के लिए कच्चा माल तथा इमारती लकड़ियाँ प्राप्त होती हैं। भारत में शीशम, साखू, सागौन, आम, नीम, देवदार आदि महत्वपूर्ण इमारती लकड़ियाँ होती हैं। इन लकड़ियों का प्रयोग फर्नीचर जैसे-कुर्सी, मेज, पलंग बनाने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त फल, फूल, जड़ी-बूटियाँ, गोंद, रबड़, छाल, लाख आदि प्राप्त होती हैं। लाख से चूड़ियाँ, आभूषण और सजावटी वस्तुएँ तथा रबर से टायर, खिलौने और अन्य उपयोगी वस्तुएँ बनायी जाती हैं। वन तेज वर्षा में मिट्टी के कटाव को रोकते हंै तथा पेड़-पौधे पानी के वेग को कम करते हैं तथा वायु की तीव्र गति को भी कम करते हैं। इससे मिट्टी का कटाव कम होता है। अगर कटाव न रोका गया तो उपजाऊ मिट्टी बह जाएगी, तब पेड़-पौधे, घास और झाड़ियाँ नहीं उग पाएँगी। वन जहाँ आर्थिक रूप से लाभकारी होते हैं, वहीं पारिस्थितिकी सन्तुलन बनाए रखने में भी यह सहायक होते हैं। वनों में बहुत से पक्षी पेड़ों पर घोंसला बनाकर रहते हैं जैसे गौरैया, तोते, चील, कबूतर आदि। अनेक जानवर जैसे शेर, चीता, हाथी, बाघ, तेंदुआ, हिरन, सियार आदि झाड़ियों या गुफाओं में रहते हैं। ये जानवर वन रक्षक माने जाते हैं। इन जानवरों के डर से वन को हानि पहुँचाने वाले लोग वन में नहीं जाते हैं। 


वनों को लोग ‘‘प्राकृतिक औषधालय’’ भी कहते हैं। वनों में बहुत सी जड़ी-बूटियाँ, औषधियों के रूप में मिलती हैं-


पृथ्वी पर निवास करने वाले लाखों जीव-जन्तुओं का आश्रय स्थल व आवास घास व वन होते हैं। जैसे-जैसे मानव ने कृषि कार्य आरम्भ किया तो केवल घास के मैदान ही नष्ट नहीं हुए बल्कि वनों का भी विनाश हुआ और पृथ्वी पर रहने वाले जीव-जन्तुओं के घर उजड़ गये। इसी प्रकार उद्योगों की स्थापना, रेलवे निर्माण, सड़क निर्माण आदि के परिणामस्वरूप मानव ने अपने लिए अच्छी आवास सुविधाएँ, सुख, वैभव आदि प्राप्त किया लेकिन इसके बदले न जाने कितने जीव-जन्तुओं को अपने आवास से वंचित होना पड़ा। 

वन्य जीवों की अधिकाधिक मांग और उनके अवैध शिकार ने भी वन्य जीवों को नष्ट किया। इनमें मुख्य रूप से शेर, हाथी, बाघ हिरन, घोड़ा, चीता आदि का बड़े पैमाने पर शिकार किया जाने लगा। इस प्रकार वन्य जीवों की अनेक प्रजातियाँ संकटग्रस्त हो गयी है। इन्हीं कारणों से वन्य-जीवों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। पशु-पक्षियों की कुछ प्रजतियाँ तो पूरी तरह विलुप्त (खत्म) हो चुकी है जिन्हें विलुप्त प्रजातियों की श्रेणी में रखा जाता है जैसे डायनासोर, मेमथ। जबकि कुछ प्रजातियाँ खत्म होने की कगार पर है जैसे-बाघ, गिद्ध आदि जिन्हें संकटग्रस्त प्रजातियाँ कहते हैं।

वन एवं वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा कानून बनाए गए हैं एवं संरक्षण हेतु विशिष्ट योजनाएं आरम्भ की गई हैं। इसके अन्तर्गत भारत के विभिन्न स्थानों पर वन्यजीव अभ्यारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यान स्थापित किए गए हैं। भारत के प्रमुख राज्यों के वन्यजीव अभ्यारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यान निम्नलिखित हैं-



वन्य जीवों के संरक्षण संबंधी कार्यक्रम-

•लुप्त प्रजातियों का प्रजनन केन्द्र कुकरैल वन, लखनऊ में 1984-85 में स्थापित हुआ। 

•राष्ट्रीय चम्बल वन्यजीव विहार योजना उ0प्र0, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान की संयुक्त योजना है जो मगर व घड़ियाल के संरक्षण हेतु शुरू की गयी है। 

•घड़ियाल प्रजनन केन्द्र दो हैं-कुकरैल वन (लखनऊ) तथा कतरनियाघाट वन्यजीव विहार (बहराइच)।

•प्रोजेक्ट एलीफैण्ट-1992 से  भारत सरकार द्वारा कुछ राज्यों में यह प्रोजेक्ट शुरू किया गया, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य भी शामिल था। 

•एलीफैण्ट रिजर्व-बिजनौर व सहारनपुर जिलों के वन्य क्षेत्र में निर्माणाधीन हैं। 

•इटावा के फिशर वन में बब्बर शेर प्रजनन केन्द्र तथा लाॅयन सफारी पार्क का निर्माण किया जा रहा है। 

•भारत का पहला नाइट सफारी पार्क (रात्रि वन्यजीव पार्क) ग्रेटर नोएडा में निर्माणाधीन है। 

•इको डेवलपमेन्ट प्रोग्राम-इसका उद्देश्य संरक्षित वन क्षेत्रों के निकटवर्ती क्षेत्रों में वन उपज का विकास करना है। 

सामाजिक वानिकी योजना

•आॅपरेशन ग्रीन योजना-प्रदेश में वृक्षारोपण के प्रोत्साहन एवं संवर्धन के लिए 01 जुलाई, 2001 से यह योजना शुरू की गयी थी। इसका उद्देश्य प्रदेश में हरित क्षेत्र का विस्तार एवं वनों/उद्यानों का उन्नयन करना है। 

•वन महोत्सव-1952 से देश के साथ-साथ प्रदेश में भी 01 जुलाई से 07 जुलाई तक मनाया जाता है। 

•उ0प्र0 वानिकी परियोजना-विश्व बैंक की सहायता से 19 मार्च 1998 से शुरू की गयी थी।

हमारे जीवन में वनों के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए 21 मार्च को विश्व वन दिवस मनाया जाता है। 

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