पूसी एक काले रंग की प्यारी सी बिल्ली थी। उसकी आँखें हरे रँग की थी जो रोशनी पड़ने पर कंचे सी चमकती थी। उसे अपनी झबरीली पूँछ बहुत पसँद थी, और पूँछ गंदी होने के डर से वह कभी भी गंदी ज़मीन पर नहीं बैठती थी। पसँद तो उसे अपनी खूबसूरत आँखें भी आती, पर भला वह उन्हें कहाँ देख सकती थी। वह हमेशा नीटू के साथ ही रहती थी, क्योंकि नीटू उसे बहुत प्यार करता था। नीटू था तो आठवीं कक्षा में, पर वह हमेशा अपने से छोटे बच्चों और पूसी के साथ ही खेला करता था। पूसी तो जैसे उसकी जान थी।

नटखट पूसी  natkhat poosi ki kahani pariyon ki kahani in hindi

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वह जितनी देर घर में रहता, उसे अपने साथ ही रखता। वह अपने हाथ से उसका काँच का कटोरा साफ़ करता, बिस्किट के टुकड़े कर उन्हें दूध में मिलाता और हर रविवार को पापा के साथ जाकर पूसी के लिए मछली लाता। पूसी भी दरवाज़े पर ही बैठकर उसका रास्ता तब तक देखती, जब तक नीटू लौटकर नहीं आता था। पर आजकल पूसी सबसे ज़्यादा खुश रहती थी क्योंकि नीटू कहानियों की एक किताब खरीद कर लाया था। नीटू ज़ोर-ज़ोर से उन कहानियों को पढ़ता और खूब हँसता। उससे भी ज़्यादा अगर कोई हँसता तो वह थी पूसी

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पूसी को कहानियाँ सुनने में बहुत मज़ा आता था। वह नीटू के पैर के पास बैठकर बहुत गौर से कहानियाँ सुनती और उसके बाद ज़मीन पर लोटकर खूब हँसती थी। कभी वह खुशी के मारे ज़मीन पर औंधी गिर कर लुढ़क जाती तो कभी दो पैरों पर चलने लगती। नीटू को भी उस की हरकतें देख कर बहुत मजा आता। आजकल बिल्लियों के ग्रुप में पूसी की पूछ बहुत बढ़ गई थी, क्योंकि जब भी वह उनसे मिलती तो अपने किस्से कहानियों का पिटारा खोलकर बैठ जाती और सभी बिल्लियाँ हँसते-हँसते दोहरी हो जाती।

पर भला नीटू कैसे जान पाता कि पूसी हँस रही है। उसे तो जब पूसी, फ़र्श पर लोटती दिखती, तो उसे लगता कि पूसी की तबीयत ठीक नहीं है, तभी वह आजकल अजीबोगरीब हरकतें करती रहती है। पर ना तो नीटू का चिल्लाते हुए कहानियाँ पढ़ना बंद हुआ और ना ही पूसी का।

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